Nageshwara Charitable trust is project Implementation agency of NABARDs TDF wadi project. 4400 marginal tribal families are getting benefited by this integrated tribal development project. Project area is comprising of 36 villages of Chikhaldara block. 12 villages in Chandrabhaga cluster, 17 villages in Tembrusonda cluster & 8 villages in Katkumbh cluster.
Tuesday, March 27, 2012
Saturday, December 17, 2011
Project component
1st Fortnight of December
News get Published in Daily "Sakal"
Matka installation for moisture base irrigation
Convergence through MGNREGS
New Dug well initiated by 'Shramdan'
Smockless chulha making at Ramtek
2nd year plant @ Malkapur
New dug wells at malkapur
Contour at Badnapur
Compost Pit Toranwadi
Matka installation and Mulching- Toranwadi
Hirdamal staging
New dug Well Manjarkapdi
Dam Repaired at Borala
Monday, December 12, 2011
Four friends
जहाँ चार यार ...
बचपन की यारी वक़्त के साथ ज्यादातर कुछ खट्टी मीठी यादें बन कर रह जाती है. और जाब बात एक अति पिछड़े आदिवासी गाँव के कुछ बच्चों की हो तो फिर रोजी की तलाश में खानाबदोशों सी जिंदगी बसर करना ही नियति होती है. ऐसे में दोस्ती जैसे रिश्ते के मायने और निभाने की बातें बहुत व्यावहारिक नहीं होते. पर मेलघाट के सीमांत गाँव बोराला के भारत जम्बू और उनके तिन दोस्तों ने न सिर्फ साथ रहकर अपनी दोस्ती निभाई है बल्कि गाँव का सामाजिक परिप्रेक्ष्य भी बदल कर रख दिया है. चारों दोस्त आज नाबार्ड अर्थसहाय्यित वाड़ी प्रकल्प की बोराला ग्राम नियोजन समिति के कर्णधार है. बाबाराव बेठे इस समिति का अध्यक्ष है तो वहीँ भारत जाम्बु, दयाराम जाम्बु और दीपक महल्ले ग्राम नियोजन समिति में सदस्य है. (Continue)
Wednesday, December 07, 2011
clean village activity
डॉ. आंबेडकर जयंती पर गाँव स्वछता अभियान
समाज के पिछड़े तपके के जीवनस्तर को ऊँचा उठाने के लिए जीवन भर प्रयत्न करने वाले डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को श्रद्धांजलि देने का मलकपुर गाँव की महिलाओं ने एक अनोखा तरीका सोचा. ६ दिसंबर को सभी बचत गत की महिलाओं और स्कूली बच्चों ने मिलकर गाँव को पूरी तरह से साफ़ सुथरा किया. वाड़ी प्रकल्प के इस गाँव में महिलाओं ने ही १००% शराब बंदी की है. आज इस गाँव के बचत गत विविध आय अर्जक गतिविधियों के साथ ही सामाजिक नेतृत्व में भी सक्रीय सहभाग ले रही है.
प्रकल्प के सामाजिक कार्यकर्त्ता सुधाकर मोहोड इन्होने डॉ. आंबेडकर की जीवनी पर प्रकाश डाला. प्रकल्प के सभी कार्यकर्ताओं ने भी गांववालों के साथ इस गतिविधि में सक्रीय योगदान किया.
Tuesday, December 06, 2011
organic compost fertilizer
समाधी खाद
जानवर और इंसान का रिश्ता उतना ही पुराना है जितना की इंसान का अस्तित्व. खासकर जब बात आदिवासियों की हो तो उनके जानवर खेती, घर, त्यौहार लेन-देन से जिन्दगी के हर क्षेत्र में अनन्य साधारण महत्त्व रखते है. पर जहाँ इंसान की जिन्दगी ख़त्म होने पर एक सन्मानजनक विदाई होती है तो वहीँ बेचारे जानवर को सड़ने के लिए फेंक दिया जाता है. पर मरने के बाद भी जानवर खेती करने वाले किसान को एक इसी बेशकीमती सौगात दे सकता है, जिसके बारे में अधिकाँश गाँव वाले अनभिग्य होंगे, अगर मरे हुए जानवर को एक सही तरीके से दफनाया जाये तो तो अगले ८ महीनों में एक अति उपयुक्त खाद बन के तैयार हो जाएगी. जिसका की उपयोग ५ एकड़ के खेती को सुजलाम सुफलाम बनाने के लिए किया जा सकता है. फास्फोरस की प्रचुर मात्र से परिपूर्ण इस खाद को बनाने का तरीका काफी आसान है.
विधि-
- जानवर के आकार का एक गड्ढा खोद लें.
- गड्ढे को गोबर से लिप दें.
- नीचें १० से १२ किलो नमक डाल दें .
- जानवर को हलके से उस गड्ढे में उतार दें.
- उसपर फिर से १० से १२ किलो नमक डाल दें.
- गोबर और अन्य कचरे से गड्ढे को ऊपर टीला बना के भर दें.
- ठीक बीचों बिच निशानदेही के लिए एक पत्थर गाड़ दें.
Saturday, December 03, 2011
Water resource development
सरकारी और सामाजिक योजनाओं में जनसहभाग न होने का ठीकरा हमेशा से मेळघाट के आदिवासी समुदाय पर फोड़ा जाता है. पर नागेश्वरा
चैरिटेबल ट्रस्ट ने नाबार्ड पुरस्कृत वाड़ी परियोजना के माध्यम से श्रमदान और जनसहभाग को गाँववालों के लिए एक सन्मानजनक आदत बनाया है.
२० नवम्बर से शुरू हुए इस अभियान में अभी तक १५ नए कुँओं का निर्माण, पुराने बांधों की दुरुस्ती, छोटे छोटे वनराई बांधों की निर्मिती जैसे कई काम अमल में आ रहें है . जिस वजह से रबी की फसल के लिए भरपूर पानी की उपलब्धता सुनिश्चित हो पाई है. रोजगार की तलाश में जिन लोगों ने पहले पलायन का मन बना लिया था, आज वो ही लोग अपने खेतों में बुआई में जुटे है.
कुँओं का निर्माण और दुरुस्ती-
इस साल ४० से अधिक नए कुओं को बनाने की योजना है. गाँव की समिति द्वारा १० से १५ फुट की खुदाई श्रमदान से करवाने के बाद आगे की खुदाई और निर्माण कार्य प्रकल्प के अनुदान से करवाया जा रहा है. १०० से ज्यादा पुराने कुओं को भी ठीक करवाया जा रहा है. पर जिनके कुँओं को सुधारा जायेगा उन्हें अपने खेत के आस पास की वाडियों को पानी देने का प्रतिज्ञापत्र देना होता है. और जो वाड़ी धारक इससे लाभान्वित होंगे वे श्रमदान के माध्यम से अपना सहयोग कुंवे की दुरुस्ती में देते है.
बोरी बांध-
छोटे छोटे जलप्रवाह और स्त्रोतों के पानी को रोकने का सबसे बढ़िया उपाय है बोरी बांध . मलकापुर, चिचाटी, बोराला, बदनापुर, काजलड़ोह सहित अनेक गांवों में प्रकल्प के लाभार्थियों ने श्रमदान से कई बाँध बनाये है. प्रकल्प द्वारा बोरी और सुतली उपलब्ध करवा देने के अलावा तांत्रिक मार्गदर्शन भी किया जाता है. जहाँ शुरुवात में केवल ३० बोरी बंधों का काम प्रस्तावित था वो आज ७० से भी अधिक होनेवाला है.इस पानी का उपयोग वाड़ी के साथ ही फसलों के सिंचन और मवेशियों के पेयजल के रूप में भी हो रहा है.
Tuesday, November 29, 2011
उम्मीदों का बांध
उम्मीदों का बांध
पर्यटन क्षेत्र चिखलदरा की तराई में बसा गाँव चिचाटी जितना सुन्दर है उतना ही इनकी आजीविका का प्रश्न कुरूप है. शहरी जीवन से अलग थलग पड़े चिचाटी गाँव में उबड़ खाबड़ जमीन का सीना चिर कर अनाज उगने के सिवा रोजी का कोई दूसरा साधन नहीं है. उसमें भी जंगली जानवरों का भय और जल संसाधनों का अभाव परिस्तिथि को बदतर कर रहा है. गाँव के पीछे बने एकमात्र बाँध में पिछले कई सालों से दरवाजे न होने से पहाड़ से उतरने वाला एक बूंद पानी भी सहेजना मुश्किल था.
गाँव में इसी साल से शुरू हुए नाबार्ड वाड़ी परियोजना की गाँव नियोजन समिति ने प्रकल्प क्रियान्वन संस्था नागेश्वरा चैरिटेबल ट्रस्ट से इस बांध में गेट लगाने का अनुरोध किया. गेट निर्माण का खर्च प्रकल्प द्वारा और बांध की सफाई और मिटटी भरने का श्रमदान गाँव का होगा यह बात तय हुई. बांध के दरवाजे का खांचा टेढ़ा होने की वजह से गेट की फिटिंग नामुमकिन हो गयी, पर गाँव वालों के सहकार्य से बांध के खांचे तोड़ कर सीधे किये गए और लोहे के दरवाजे लगाये गए.
दो दिन में ही बांध पानी से लबालब भर गया. अब चिचाटी के कई किसान पलायन की बजाय ठण्ड में गेहूं और चने की फसल की तयारी कर रहे है. प्रकल्प के एक कार्यकर्त्ता डॉ.अमोल मामनकर तो पिछले कई दिनों से इसी गाँव में रह रहे है. सामाजिक परिवर्तन के सहभागिता के सिद्धांत को चरितार्थ करते हुए अमोल ने आज इस गाँव को अपना परिवार बना लिया है. वाड़ी प्रकल्प के माध्यम से लगी आम और आंवले की वडियों की देखभाल के गुर सिखाने के साथ ही वह किसानों के जानवरों का निशुल्क इलाज भी कर रहा है. आज इस गाँव में मुर्गी पालन , गाय की प्रजाति सुधार जैसे प्रयास भी जोरों पर है.
गाँव में इसी साल से शुरू हुए नाबार्ड वाड़ी परियोजना की गाँव नियोजन समिति ने प्रकल्प क्रियान्वन संस्था नागेश्वरा चैरिटेबल ट्रस्ट से इस बांध में गेट लगाने का अनुरोध किया. गेट निर्माण का खर्च प्रकल्प द्वारा और बांध की सफाई और मिटटी भरने का श्रमदान गाँव का होगा यह बात तय हुई. बांध के दरवाजे का खांचा टेढ़ा होने की वजह से गेट की फिटिंग नामुमकिन हो गयी, पर गाँव वालों के सहकार्य से बांध के खांचे तोड़ कर सीधे किये गए और लोहे के दरवाजे लगाये गए.
दो दिन में ही बांध पानी से लबालब भर गया. अब चिचाटी के कई किसान पलायन की बजाय ठण्ड में गेहूं और चने की फसल की तयारी कर रहे है. प्रकल्प के एक कार्यकर्त्ता डॉ.अमोल मामनकर तो पिछले कई दिनों से इसी गाँव में रह रहे है. सामाजिक परिवर्तन के सहभागिता के सिद्धांत को चरितार्थ करते हुए अमोल ने आज इस गाँव को अपना परिवार बना लिया है. वाड़ी प्रकल्प के माध्यम से लगी आम और आंवले की वडियों की देखभाल के गुर सिखाने के साथ ही वह किसानों के जानवरों का निशुल्क इलाज भी कर रहा है. आज इस गाँव में मुर्गी पालन , गाय की प्रजाति सुधार जैसे प्रयास भी जोरों पर है.
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