Tuesday, November 29, 2011

उम्मीदों का बांध

उम्मीदों का बांध 
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पर्यटन क्षेत्र चिखलदरा की तराई में बसा गाँव चिचाटी जितना सुन्दर है उतना ही इनकी आजीविका का प्रश्न कुरूप है. शहरी जीवन से अलग थलग पड़े चिचाटी  गाँव में  उबड़ खाबड़ जमीन का सीना चिर कर अनाज उगने के सिवा रोजी का कोई दूसरा साधन नहीं है. उसमें भी जंगली जानवरों का भय और जल संसाधनों का अभाव परिस्तिथि को बदतर कर रहा है. गाँव के पीछे बने एकमात्र बाँध में पिछले  कई सालों से दरवाजे न होने से पहाड़ से उतरने वाला एक बूंद पानी भी सहेजना मुश्किल था.
गाँव में इसी साल से शुरू हुए नाबार्ड वाड़ी परियोजना  की गाँव नियोजन समिति ने प्रकल्प क्रियान्वन संस्था नागेश्वरा चैरिटेबल ट्रस्ट से इस बांध में गेट लगाने का अनुरोध किया. गेट निर्माण का खर्च प्रकल्प द्वारा और बांध की सफाई और मिटटी भरने का श्रमदान गाँव का होगा यह बात तय हुई. बांध के दरवाजे का खांचा टेढ़ा होने की वजह से गेट की फिटिंग नामुमकिन हो गयी, पर गाँव वालों के सहकार्य से बांध के खांचे तोड़ कर सीधे किये गए और लोहे के दरवाजे लगाये गए.  
दो दिन में ही बांध पानी से लबालब भर गया. अब चिचाटी   के कई किसान पलायन की बजाय ठण्ड में गेहूं और चने की फसल की तयारी कर रहे है. प्रकल्प के एक कार्यकर्त्ता डॉ.अमोल मामनकर तो पिछले कई दिनों से इसी गाँव में रह रहे है. सामाजिक परिवर्तन के सहभागिता के सिद्धांत को चरितार्थ करते हुए अमोल ने आज इस गाँव को अपना परिवार बना लिया है. वाड़ी प्रकल्प के माध्यम से लगी आम और आंवले की वडियों की देखभाल के गुर सिखाने के साथ ही वह किसानों के जानवरों का निशुल्क इलाज भी कर रहा है. आज इस गाँव में मुर्गी पालन , गाय की प्रजाति  सुधार जैसे प्रयास भी जोरों पर है.

वाह आजू भैया ....

वाह आजू  भैया ....
      ३ साल पहले तक आजू झोले अखंडे अचलपुर की एक संतरा वाड़ी में ३०० रूपये सप्ताह की दर से मजदूरी किया करता था. पाँच बच्चों का परिवार पालने के लिए पत्नी को भी लोगों के घर काम करना पड़ता था. चिखलदरा के बामादेही गाँव के आजू के हिस्से तिन भाइयों में बांटकर ढाई एकड़ खेती ही बची थी, वो भी ऐसी उबड़ खाबड़ और बंजर की खेती उसके लिए एक दुष्ट स्वप्न बन कर रह गया था. अपनी मिटटी को छोड़ ७०  किलोमीटर दूर दूसरों की गुलामी करते हुए भी आजू के हौसलों ने अभी हिम्मत नहीं हारी थी. गुलामी की इस जिन्दगी में उसके पास अपने बच्चों को देने के लिए मज़बूरी छोड़ के कुछ नहीं होगा इस बात का उसे बखूबी अहसास था. सरकार द्वारा आदिवासियों के लिए चल रही विविध योजनाओं के बारे में उसने सुना था. आखिरकार आजू ने मजदूरी छोड़ कर फिर से अपनी मिटटी का रुख किया. 

आज उसके पास २ भैस २ गायें २ बैल और ३ बकरियां  है, वह साल में दो फसल लेता है बरसात में सोयाबीन और ठण्ड में गेहूं -चना , आजू के खेत में केसर आम और आंवलों के पौधे सुनहरे भविष्य की बानगी दे रहें है. उसकी १० वि कक्षा पास एक लड़की की शादी हो गयी है, २ लड़कियां  १२ वि कक्षा तक पंहुची, आज सबसे छोटी बेटी शारदा ८ वि कक्षा में पढ़ रही है. तो उससे बड़ा विजय १० वि की तयारी कर रहा है. आजू अखंडे आज नाबार्ड  बैंक की वाड़ी परियोजना की बामादेही गाँव नियोजन समिति का समन्वयक है.

आज जहाँ आजू पहुंचा है वो उसे जानने वालों के लिए अविश्वसनीय होगा. परन्तु सकारात्मक सोच और कड़े परिश्रम ने उसकी किस्मत के दरवाजे खोल दियें है.


आजू और उसकी पत्नी ने दिन रात कड़ी मेहनत करके पहाड़ी जमीं को खेती योग्य बनाया. प्रोजेक्ट ऑफिस धारणी से डीजल इंजिन प्राप्त किया. रोजगार गेरेंटी योजना से नया कुँवा बनवाया. और आजू की इसी प्रगति वादी सोच को पंख दिए नाबार्ड की वाड़ी पारियोजना ने. ७ साल बाद एक एकड़ जमीन से १ लाख की कमाई का सपना अखंडे परिवार बुन रहा है. प्रकल्प क्रियान्वन संस्था नागेश्वर चैरिटेबल ट्रस्ट  भी उनके इन सपनों में रंग भरने के लिए हर कदम उनके साथ है. प्रकल्प कार्यकर्ताओं के मार्गदर्शन से खडी पहाड़ी ढलान पर आम के पेड़ हेतु  जो पत्थर का चबूतरे उसने बनाये  है, वो उसकी अपने भविष्य का शिल्पकार खुद बनने की कटिबद्धता को दर्शाता है.  पौधों में फूटती कोंपलों  को 
 देखकर आजू के चेहरे पर वही ख़ुशी है जो एक बाप को अपने बच्चे को बढ़ता देख होती है.

Monday, November 28, 2011

अमृतजल

अमृतजल 
यानि की अमर करने वाला जल. गाँव में सहज और मुफ्त में उपलब्ध गोबर और गोमूत्र से बनने वाले इस अमृत जल ने मेलघाट आदिवासी किसानों को एक नयी सोच दी है. आज वे इसका इस्तेमाल आम के पौधों में ही  नहीं वरन खेती में भी कर रहें है. जैविक खेती का यह मूल मन्त्र नागेश्वारा चैरिटेबल ट्रस्ट घर घर तक पंहुचा रही है.